सर्वदेव पूजा विधान पूजा विधान

   अमृत जीवन सेवा संस्थान

सर्वदेव पूजा विधान पूजा विधान

प्रारंभिक पूजा और स्वस्तिवाचन

पूजन प्रारंभ करने से पहले पूजा वाले स्थान पर और पूजा वाली सामग्री पर जल छिड़क कर पवित्रीकरण करें

निम्न मंत्र बोलते हुए अपने ऊपर एवं पूजन सामग्री पर जल छिड़कें

अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं बाह्याभ्यंतरः शुचिः

पुनः पुण्डरीकाक्षं, पुनः पुण्डरीकाक्षं, पुनः पुण्डरीकाक्षं

निम्न मंत्र से अपने आसन पर उपरोक्त तरह से जल छिड़कें-

पृथ्वी त्वया घता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता त्वं धारय मां देवि पवित्रं कुरु आसनम्

निम्न मंत्र के पाठ से ग्रंथि बंधन या गठजोड़ा करें-

यदाबध्नन दाक्षायणा हिरण्य(गुं)शतानीकाय सुमनस्यमानाः तन्म बन्धामि शत शारदायायुष्यंजरदष्टियर्थासम्

निम्न मंत्र से शिखा बंधन करें

चिद्रूपिणि महामाये दिव्यतेजः समन्विते। तिष्ठ देवि शिखाबद्धे तेजोवृद्धिं कुरुष्व मे।।

निम्न मंत्र से तीन बार आचमन करें

  केशवाय नमः,  नारायणाय नमः ,  माधवाय नमः

निम्न मंत्र बोलकर हाथ धो लें-

गोविन्दाय नमः हस्तं प्रक्षालयामि

निम्न मंत्र बोलकर न्यास करें

वाङ् मे आस्येऽस्तु         (मुख को)

नसोर्मे प्राणोऽस्तु           (नासिका के दोनों छिद्रों को)

अक्ष्णोर्मे चक्षुरस्तु           (दोनों नेत्रों को)

कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु        (दोनों कानों को)

बाह्वोर्मे बलमस्तु        (दोनों भुजाओं को)

ऊर्वोमे ओजोऽस्तु           (दोनों जंघाओं को)

अरिष्टानि मेऽङ्गानि, तनूस्तन्वा मे सह सन्तु (समस्त शरीर पर)निम्न मंत्र बोलकर

पुनः मंत्र बोलकर हाथ धो लें-

गोविन्दाय नमः हस्तं प्रक्षालयामि

यजमान ब्राह्मणों का तिलक करें

नमो ब्राह्मण देवाय गो ब्राह्मण हिताय ।जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नम:

यजमान ब्राह्मण को कलावा (मौली) बांधे

व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम् दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते॥

ब्राह्मण यजमान का तिलक करें 

केशवानन्न्त गोविन्द बाराह पुरुषोत्तम पुण्यं यशस्यमायुष्यं तिलकं मे प्रसीदतु   चंदनस्य महतपुण्यं पवित्रं पाप नाशनम आपदं हरति नित्यं लक्ष्मी तिष्ठति सर्वदा

यजमान ब्राह्मण को कलावा (मौली) बांधे  

येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल: तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥

निम्न मंत्र बोलकर दीपक प्रज्वलन करें

अग्निर्ज्ज्योतिज्ज्योतिरग्निः स्वाहा सूर्यो ज्ज्योतिज्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा अग्निर्व्वर्च्चो ज्ज्योतिर्व्वर्च्चः स्वाहा सूर्योव्वर्चोज्ज्योतिर्व्वर्च्चः स्वाहा ।। ज्ज्योतिः सूर्य्यः सूर्य्यो ज्ज्योतिः स्वाहा॥

भो दीप देवरूपस्त्वं कर्मसाक्षी ह्यविघ्नकृत्।

यावत्पूजासमाप्तिः स्यात्तावदत्र स्थिरो भव॥

भूर्भुवः स्वः दीपस्थदेवतायै नमः आवाहयामि सर्वोपचारार्थे गन्धाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि

दीपक प्रज्वलन कर प्रणाम करें

शुभं करोति कल्याणम् आरोग्यम् धनसंपदा शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपकाय नमोऽस्तु ते

दीपो ज्योति परं ब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दन:   दीपो हरतु मे पापं संध्यादीप नमोऽस्तु ते

निम्न मंत्र बोलकर कुश से बनी पवित्री  धारण करें

पवित्रेस्थो वैष्णव्यौ सवितुर्व्वः प्रसवऽउत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः। तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुनेतच्छकेयम्॥ 

अब निम्नलिखित मन्त्रों से दसों दिशाओं में अक्षत अथवा पीली सरसों छोडें -

पूर्वे रक्षतु गोविन्द:                     पूर्व दिशा में अक्षत अथवा पीली सरसों छोडें॥

आग्नेय्यां गरुडध्वज:                आग्ने कोण में अक्षत अथवा पीली सरसों छोडें॥

याम्यां रक्षतु वाराहो                   दक्षिण दिशा में अक्षत अथवा पीली सरसों छोडें॥

नारसिंहस्तु नैर्ऋते                     नैऋत्य कोण में अक्षत अथवा पीली सरसों छोडें॥

वारुण्यां केशवो रक्षेद्                 पश्चिम दिशा में अक्षत अथवा पीली सरसों छोडें॥

वायव्यां मधुसूदनः                    वायव्य कोण में अक्षत अथवा पीली सरसों छोडें॥

उत्तरे श्रीधरो रक्षेद्                    उत्तर दिशा में अक्षत अथवा पीली सरसों छोडें॥

ईशान्यां तु गदाधरः                  ईशान कोण में अक्षत अथवा पीली सरसों छोडें॥

ऊर्ध्वं गोवर्धनो रक्षेद्                 ऊपर की ओर में अक्षत अथवा पीली सरसों छोडें॥

अधस्तात्त त्रिविक्रमः           पृथ्वी पर में अक्षत अथवा पीली सरसों छोडें॥

एवं दशदिशो रक्षेद् वासुदेवो जनार्दन: दसों दिशाओं में में अक्षत अथवा पीली सरसों छोडें॥

अब पूजा कार्य प्रारंभ करने के लिए तथा पूजन हवन आदि की अशुद्ध वायु से रक्षा के लिए प्रार्थना करें और दसों दिशाओं को प्रणाम करें निम्न मंत्र पढ़े।

अपक्रामन्तु ते भूता ये भूता भूमिसंस्थिता : ये भूता विघ्नकर्तारस्ते नश्यन्तु शिवाज्ञया

अपक्रामन्तु भूतानि पिशाचा : सर्वतोदिश : ,सर्वेषामविरोधेन पूजाकर्म समारभे

शंख पूजन करें

शंखं चन्द्रार्कदैवत्यं वरुणं चाधिदैवतम्। पृष्ठे प्रजापतिं विद्यादग्रे गङ्गासरस्वती।।

त्रैलोक्ये यानि तीर्थानि वासुदेवस्य चाज्ञया। शंखे तिष्ठन्ति वै नित्यं तस्माच्छंखं प्रपूजयेत्॥

त्वं पुरा सागरोत्पन्नो विष्णुना विधृतः करे।

नमितः सर्वदेवैश्च पाञ्चजन्य! नमोऽस्तुते॥

पाञ्चजन्याय विद्महे पावमानाय धीमहि तन्नः शंखः प्रचोदयात्।

भूर्भवः स्वः शंखस्थदेवतायै नमः शंखस्थदेवतामावाहयामि सर्वोपचारार्थे गन्धपुष्पाणि समर्पयामि॥ 

घंटा पूजन करें

आगमार्थन्तु देवानां गमनार्थन्तु रक्षसाम्। कुरु घण्टे वरं नादं देवतास्थानसन्निधौ॥

भूर्भुवः स्वः घण्टास्थाय गरुडाय नमः गरुडमावाहयामि सर्वोपचारार्थे गन्धाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि।

निम्न मंत्र द्वारा अपने गुरु का ध्यान करें

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः, गुरुः साक्षात्परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

अखंड मंडलाकारं व्याप्तं येन चराचरम, तत पदम् दर्शितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः

अब पूजा स्थान पर बैठे हुए सभी श्रद्धालुओं के हाथ में चावल पुष्प दे कर स्वस्तिवाचन करें

॥स्वत्ययन

नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासोऽ परीतास उद्भिदः।  देवा नो यथा सदमिद् वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवे दिवे॥ देवानां भद्रा सुमतिर्ऋजूयतां देवाना ग्वँग् रातिरभि नो निवर्तताम्।  देवाना ग्वँग् सख्यमुपसेदिमा व्वयं देवा आयुः प्रतिरन्तु जीवसे॥ तान्पूर्वया निविदा हूमहे वयं भगं मित्रामदितिं दक्षमश्रिधम्। अर्यमणं वरुण ग्वँग् सोममश्विना सरस्वती नः सुभगा मयस्करत्॥ तन्नो व्वातो मयोभु वातु भेषजं तन्माता पृथिवी तत्पिता द्यौः।  तद् ग्रावाणः सोमसुतो मयोभुवस्तदश्विना शृणुतं धिष्ण्या युवम्॥ तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियञ्जिन्वम वसे हूमहे वयम्। पूषा नो यथा वेदसामसद् वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये। स्वस्ति : इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्व वेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥ पृषदश्वा मरुतः पृश्निमातरः शुभं यावानो विदथेषु जग्मयः। अग्निर्जिह्ना मनवः सूरचक्षसो विश्वे नो देवा अवसागमन्निह॥ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः। स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवा ग्वँग् सस्तनुभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायुः॥ शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम्। पुत्रसो यत्रा पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः। अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता पिता पुत्राः। विश्वे देवा अदितिः पञ्चजना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम्॥ द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष ग्वँग् शान्तिः पृथिवी शान्ति रापः शान्ति रोषधयः शान्तिर्व्वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्मशान्तिः सर्वं ग्वँग् शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सामा शान्तिरेधि॥ यतो यतः समीहसे ततो नोऽअभयं कुरू। शं नः कुरु प्रजाभ्योऽभयं नः पशुब्भ्यः,सुशान्तिर्भवतु।॥

हाथ में लिए पुष्प और अक्षत गणेश एवं गौरी पर चढ़ा दें।

पुनः हाथ में पुष्प अक्षत आदि लेकर मंगल श्लोक पढ़े।

सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः   लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः 1

धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः ।द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि 2

विद्यारम्भे विवाहे प्रवेशे निर्गमे तथा सङ्ग्रामे सङ्कटे चैव विघ्नस्तस्य जायते 3

शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम् प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये 4

अभीप्सितार्थ-सिद्धîर्थं पूजितो यः सुराऽसुरैः सर्वविघ्नहरस्तस्मै गणाधिपतये नमः 5

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ! शरण्ये त्रयम्बके गौरि नारायणि ! नमोऽस्तु ते 6

सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषाममङ्गलम् येषां हृदिस्थो भगवान् मङ्गलायतनो हरिः 7

तदेव लग्नं सुदिनं तदेव ताराबलं चन्द्रबलं तदेव विद्यावलं दैवबलं तदेव लक्ष्मीपते तेऽङ्घ्रियुगं स्मरामि॥8

लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः 9

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः   तत्र श्रीर्विजयो भूतिध्र्रुवा नीतिर्मतिर्मम 10

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् 11

स्मृतेः सकलकल्याणं भाजनं यत्र जायते पुरुषं तमजं नित्यं ब्रजामि शरणं हरिम् 12

सर्वेष्वारम्भकार्येषु त्रयस्त्रिभुवनेश्वराः देवा दिशन्तु नः सिद्धिं ब्रह्मेशानजनार्दनाः 13

विश्वेशं माधवं ढुण्ढिं दण्डपाणिं भैरवम् वन्दे काशीं गुहां गङ्गां भवानीं मणिकर्णिकाम् 14

वक्रतुण्ड ! महाकाय ! कोटिसूर्यसमप्रभ ! निर्विघ्नं कुरु मे देव ! सर्वकार्येषु सर्वदा 15

हाथ में लिये अक्षत-पुष्प को गणेशाम्बिका पर चढ़ा दें।

पुनः हाथ में पुष्प अक्षत आदि लेकर मंगल श्लोक पढ़े।

श्रीमन्महागणाधिपतये नमः।लक्ष्मीनारायणाभ्यां नमः। उमामहेश्वराभ्यां नमः। वाणीहिरण्य गर्भाभ्यां नमः।शचीपुरन्दराभ्यां नमः।मातापितृचरणकमलेभ्यो नमः। इष्टदेवताभ्यो नमः। कुलदेवताभ्यो नमः। ग्रामदेवताभ्यो नमः। वास्तुदेवताभ्यो नमः।स्थानदेवताभ्यो नमः। सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः।  सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नमः। सिद्धिबुद्धिसहिताय श्रीमन्महागणाधिपतये नमः॥

हाथ में लिये अक्षत-पुष्प को गणेशाम्बिका पर चढ़ा दें।

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