वरुण कलश स्थापना पूजा विधान

 वरुण कलश स्थापना पूजा विधान

धर्म शास्त्र के अनुसार किसी भी पूजा, त्योहार, संस्कार अनुष्ठान आदि में कलश स्थापना और पूजन के बिना कोई भी मंगलकार्य पूर्ण नहीं  होता है। कलश को समस्त ब्रह्राण्ड का प्रतीक माना जाता है क्योंकि ब्रह्राण्ड का आकार भी घट के सामान है। घट में  समस्त सृष्टि का समावेश है इसमें सभी देवी देवता, नदी, पर्वत,तीर्थ आदि उपस्थित रहते है। इसलिए कलश स्थापना करना हिंदू धर्म में सभी प्रकार की पूजा में अनिवार्य है।

कलश  स्थापना ईशान कोण की जानी चाहिए। कलश तांबे का शुभ माना जाता है तांबे का कलश उपलब्ध ना हो तो मिट्टी का कलश भी प्रयोग किया जा सकता है।  

वरुण कलश स्थापन पूजन

जिस स्थान पर कलश स्थापना करना है उस स्थान पर अष्टदल कमल बनाकर उस भूमि का स्पर्श कर निम्न मंत्र को पढ़ें 

हाथ में गन्ध,अक्षत और पुष्प लेकर पृथ्वी की पूजा करें-

ॐ भूरसि भूमिरस्यदितिरसि विश्वधाया विश्वस्य भुवनस्य धर्त्री। पृथिवीं यच्छ पृथिवीं दृ ग्वँग् ह पृथिवीं माहि ग्वँग् सीः॥

पुनः निम्न मंत्र से उस स्थान पर जौ रखें

ॐ धान्यमसि धिनुहि देवान्प्राणायत्त्वोदानायत्वा व्यानायत्वा दीर्घानुप्रसितिमायुषेधान्देवो वः सविता हिरण्यपाणिः प्रतिगृभ्णात्वच्छिदे्रेण पाणिना चक्षुषे त्वां महीनां पयोसि॥

कलश पर स्वस्तिक का चिह्न बनाकर तीन धागेवाली मौली (कलावा) बांधकर, उस कलश को जौ के ऊपर रखें निम्न मंत्र से कलश स्थापित करें।-

ॐ आजिघ्र कलशं मह्या त्वा विशत्विंदवः। पुनरूज्र्जा निवर्तस्वसानः। सहश्रन्धुक्ष्वोरुधारा पयस्वती पुनम्र्मा विशताद्रयिः॥

निम्न मंत्र से कलश में जल डालें –

ॐ वरुणस्योत्तम्भनमसि वरुणस्य स्कम्भसर्जनीस्थो वरुणस्य ऋतसदन्यसि वरुणस्य ऋतसदनमसि वरुणस्य ऋतसदनमासीद॥

निम्न मंत्र से कलश में चन्दन डालें –

ॐ त्वां गन्धर्वा अखनँस्त्वामिन्द्रस्त्वां बृहस्पतिः। त्वामोषधे सोमो राजा विद्वान् यक्ष्मादमुच्यत॥

निम्न मंत्र से कलश में सर्वौषधि डालें।

ॐ या ओषधीः पूर्वा जाता देवेभ्यस्त्रिायुगं पुरा। मनै नु बभ्रूणामहं शतं धामानि सप्त च॥

निम्न मंत्र से कलश में दूर्वा डालें-

ॐ काण्डात्काण्डात्प्ररोहन्ती परुषः परुषस्परि। एवानो दूर्वे प्रतनु सहश्रेण शतेन च॥

निम्न मंत्र से कलश के मुख पर पंच पल्लव रखें

ॐ अश्वत्थे वो निषदनं पर्णे वो वसतिष्कृता गोभाज इत्किला सथ यत्सनवथ पूरुषम्॥

निम्न मंत्र से कलश में पवित्र कुश डालें-

ॐ पवित्रोस्थो वैष्णव्यौ सविर्तुर्वः प्रसव उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रोण सूर्यस्य रश्मिभिः। तस्य ते पवित्रापते पवित्रापूतस्य यत्कामः पुने तच्छकेयम्॥

निम्न मंत्र से कलश में सप्तमृत्तिका डालें-

ॐ स्योना पृथिविनो भवानृक्षरा निवेशनी। यच्छा नः शर्म्म सप्रथाः।

निम्न मंत्र से कलश में पूगीफल डालें-

ॐ याः फलिनीर्या अफला अपुष्पायाश्च पुष्पिणीः। बृहस्पति प्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्व ग्वँग् हसः॥

निम्न मंत्र से कलश में पंचरत्न डालें-

ॐ परिवाजपतिः कविरग्निर्हव्यान्यक्रमीत् दधद्रत्नानि दाशुषे॥

निम्न मंत्र से कलश में दक्षिणा डालें-

ॐ हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्। सदाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम॥

निम्नलिखित मंत्र पढ़कर कलर्स को वस्त्र से अलंकृत करें

ॐ युवा सुवासाः परिवीत आगात् स उश्रेयान् भवति जायमानः। तं धीरासः कवय उन्नयन्ति साध्यो मनसा देवयन्तः॥

निम्न मंत्र से चावल से भरा पूर्ण पात्र कलश के ऊपर रखें

ॐ पूर्णादर्वि परापत सुपूर्णा पुनरापत। वस्नेव विक्रीणावहा इषमूर्ज र्ठ. शतक्रतो॥

रक्त वस्त्र से लिपटा नारियल निम्न मंत्र से कलश के ऊपर रखें

ॐ याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः। बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्व ग्वँग् हसः॥

निम्न मंत्र से वरुण का आवाहन

ॐ तत्वायामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदाशास्ते यजमानो हविर्भिः। अहेडमानो वरुणेह बोद्ध्युरुश र्ठ. समान आयुः प्र मोषीः॥ अस्मिन् कलशे वरुणं साङ्ं सपरिवारं सायुधं सशक्तिकम् आवाहयामि स्थापयामि॥   

ॐ भूर्भुवः स्वः इहा गच्छ इहा तिष्ठ स्थापयामी, पूजयामी मम पूजां गृहाण। ॐ भूर्भुवः स्वः अपां पतये वरुणाय नमः ॥

तत्पश्चात हाथ में अक्षत पुष्प लेकर चारों वेद एवं देवी देवताओं का आह्वान करें

कलशस्य मुखे विष्णुः कंठे रुद्रः समाश्रितः। 

मूले त्वस्य स्थतो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः॥
कुक्षौ तु सागराः सर्वे,सप्तद्वीपा वसुंधराः।

ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदो ह्यथर्वणः॥
अंगैश्च सहिताः सर्वे कलशं तु समाश्रिताः ।

अत्र गायत्री सावित्री शांति पुष्टिकरी तथा ॥

आयान्तु मम कामस्य दुरितक्षयकारकाः।

गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति॥

नर्मदे सिंधु कावेरी जलेऽस्मिन्‌ सन्निधिं कुरु।

सर्वे समुद्राः सरितस्तीथर्यानि जलदा नदाः॥

आयान्तु देवपूजार्थं दुरितक्षयकारकाः॥

हाथ के अक्षत फूल कलश पर चढ़ा दे 

हाथ में अक्षत पुष्प लेकर निम्न  मंत्र से कलश की प्रतिष्ठा करें

ॐ मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनोत्वरिष्टं यज्ञ समिमं दधातु । विश्वे देवास इह मादयन्तामो३म्प्रतिष्ठ ॥

कलशे वरुणाद्यावाहितदेवताः सुप्रतिष्ठिता वरदा भवन्तु। ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः ।

प्रतिष्ठा के लिए हाथ में लिए हुए चावल और पुष्प कलश के ऊपर चढ़ा दे

अब विधिवत अनुसार कलश का षोडशोपचार पूजन करें

पद्य के लिए जल चढायें-:  ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः, पादयोः पाद्यं समर्पयामि।

अर्घ्य के लिए जल चढायें -:  ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः, हस्तयोरर्घ्यम् समर्पयामि।

स्नान के लिए जल चढायें -: ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः, स्नानीयं जलं समर्पयामि।

आचमन के लिए जल चढायें -: ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः, स्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि।

पञ्चामृत से स्नान करायें-:  ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः, पञ्चामृतस्नानं सर्पयामि ।

गन्धोदक-स्नान करायें-:  ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः, गन्धोदकस्नानं समर्पयामि।

शुद्धोदक-स्नान करायें -: ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः, स्रानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि।

आचमन के लिये जल चढ़ायें-:  ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः, शुद्धोदकस्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि।

वस्त्र अर्पण करें -:   ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः, वस्त्रं समर्पयामि ।

आचमन के लिये जल चढ़ायें -:  ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः, वस्त्रान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि।

यज्ञोपवीत अर्पण करें -:  ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः, यज्ञोपवीतं समर्पयामि ।

आचमन के लिये जल चढ़ायें-:  ॐ बरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः, यज्ञोपवीतान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि।

उपवस्त्र अर्पण करें-: ॐ वरुणायावाहितदेवताभ्यो नमः, उपवस्त्रं समर्पयामि।

आचमन के लिये जल चढ़ायें-:  ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः, उपवस्त्रान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि।

चन्दन अर्पण करें-: ॐ वरुणाधावाहितदेवताभ्यो नमः, चन्दनं समर्पयामि ।

अक्षत अर्पण करें-:  वरुणाधावाहितदेवताभ्यो नमः, अक्षतान समर्पयामि।

पुष्पमालाअर्पण करें-: ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः, पुष्पं पुष्पमाल्यम  समर्पयामि।

नानापरिमल-द्रव्य अर्पण करें-: ॐ वरुणाधावाहितदेवताभ्यो नमः, नाना परिमलद्रव्याणि सपर्पयामि।

सुगन्धित द्रव्य अर्पण करें-: ॐ वरुणायावाहितदेवताभ्यो नमः, सुगन्धितद्रव्यं समर्पयामि ।

धूप दिखाएं-: ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः, धूपमघ्रापयामि।

दीप दिखाएं-: ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः, दीपं दर्शयामि।

(हस्तप्रक्षालन) धूप-दीप दिखाकर हाथ धो लें।

निवेद्य चढ़ाएं-: ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः, सर्वविधं नैवेद्य निवेदयामि

ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः नैवेद्यान्ते आचमनीयं जलम्, मध्ये पानीयं जलम्, उत्तरापोऽशने मुख प्रक्षालनार्थे, हस्तप्रक्षालनार्थे च जलं समर्पयामि ।

करोद्वर्तन अर्पण करें-: ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः, करोद्वर्तनं समर्पयामि ।

फल अर्पण करें-: ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः, ऋतुफलानि समर्पयामि।

ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः फलान्ते आचमनीयं जलम्, मध्ये पानीयं जलम्, उत्तरापोऽशने मुख प्रक्षालनार्थे, हस्तप्रक्षालनार्थे च जलं समर्पयामि ।

ताम्बूल अर्पण करें-: ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः, ताम्बूलं समर्पयामि।

दक्षिणा अर्पण करें-: ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः, कृतायाः पूजायाः साद्गुण्यार्थे द्रव्य दक्षिणां समर्पयामि ।

आरती करें-: ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः, आरार्तिकं समर्पयामि।

पुष्पाञ्जलि समर्पित करें-: ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः, पापुष्पाञ्जलिं समर्पयामि ।

प्रदक्षिणा करें-: ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः, प्रदक्षिणां समर्पयामि।

हाथ में गन्ध,अक्षत और पुष्प लेकर प्रार्थना करें-:

देवदानवसंवादे मथ्यमाने महोदधौ ।

उत्पन्नोऽसितदा कुम्भ विधृतो विष्णुनास्वयम्॥

त्वत्तोये सर्वतीर्थानि देवाः सर्वे त्वयि स्थिताः ।

त्वयि तिष्ठन्ति भूतानि त्वयि प्राणाः प्रतिष्ठिताः ॥

शिवः स्वयं त्वमेवासि विष्णुस्त्वं च प्रजापतिः ।

आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवाः सपैतृकाः ॥

त्वयि तिष्ठन्ति सर्वेऽपि यतः कामफलप्रदाः ।

त्वत्प्रसादादिमा पूजा कर्तुमीहे जलोद्भव ।

सांनिध्यं कुरु मे देव प्रसन्नो भव सर्वदा॥

नमो नमस्ते स्फटिकप्रभाय सुश्वेतहाराय सुमङ्गलाय।

सुपाशहस्ताय झषासनाय जलाधिनाथाय नमो नमस्ते ॥

ॐ अपां पतये वरुणाय नमः ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः, प्रार्थनापूर्वकं नमस्कारान् समर्पयामि॥

समर्पण करें-:

कृतेन अनेन पूजनेन कलशे वरुणाद्यावाहितदेवताः प्रीयन्तां न मम॥  

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