इन्द्रादि दश दिक्पाल-पूजन, पञ्चलोकपाल- पूजन , वास्तोष्पति पूजन , क्षेत्रपालका आवाहन-स्थापन एवं पूजन ।
नवग्रह-मण्डल में परिधि के बाहर पूर्वादि दसों दिशाओं के अधिपति देवताओं (दिक्पाल देवताओं) का अक्षत छोडते हुए आवाहन एवं स्थापना करे।
1-: (पूर्व दिशा में) इन्द्र का आवाहन और स्थापना
ॐ त्रातार मिन्द्रम वितारमिन्द्र हवे हवे सुहव शूरमिन्द्रम् । ह्वयामि शक्रं पुरुहूतमिन्द्र स्वस्ति नो मघवा धात्विन्द्र: ॥
इन्द्रं सुरपति
श्रेष्ठं वज्र हस्तं महा बलम् ।
आवाहये यज्ञ सिद्धयैशत यज्ञाधिपं प्रभुम् ॥
ॐ भूर्भव: स्व: इन्द्र ! इहा
गच्छ, इह तिष्ठ इन्द्राय नम:, इन्द्र
मावाहयामि, स्थापयामि ।
2-: (अग्नि कोण में) अग्नि का आवाहन और स्थापना
ॐ अग्निं दूतं पुरो दधे हव्यवाहमुप ब्रुवे । देवाँ२ आ सादयादिह ,
त्रिपादं सप्त हस्तं च द्वि
मूर्धानं द्विनासिकम् ।
षण्नेत्रं च चतु:श्रोत्रमग्निमावाहयाम्यहम् ॥
ॐ भूर्भव: स्व: अग्ने ! इहा
गच्छ, इह तिष्ठ अग्नये नम:, अग्नि
मावाहयामि, स्थापयामि ।
3-: (दक्षिण दिशा में) यम का आवाहन और स्थापना
ॐ यमाय त्वाऽड्गिरस्वते पितृमते स्वाहा । स्वाहा धर्माय स्वाहा घर्म: पित्रे ॥
महा महिष मारुढं दण्ड हस्तं महाबलम् ।
यज्ञ संरक्षणार्थाय यममावाहयाम्यहम् ॥
ॐ भूर्भव: स्व: यम ! इहा
गच्छ, इह तिष्ठ यमाय नम:, यम
मावाहयामि, स्थापयामि ।
4-: (नैऋत्य कोण में) निऋति का आवाहन और स्थापना
ॐ असुन्वन्तमयजमानमिच्छ स्तेनस्येत्यामन्विहि तस्करस्य ।अन्यमस्मदिच्छ सा त इत्या नमो देवि निऋते तुभ्यमस्तु ॥
सर्व प्रेताधिपं देवं निऋतिं नील विग्रहम् ।
आवाहये यज्ञ सिद्धयै नरारुढं वरप्रदाम् ॥
ॐ भूर्भव: स्व: निऋते ! इहा
गच्छ, इह तिष्ठ निऋतये नम:, निऋते
मावाहयामि, स्थापयामि ।
5-: (पश्चिम दिशा में) वरूण का आवाहन और स्थापना
ॐ तत्त्वा यामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदा शास्ते यजमानो हविर्भि: । अहेडमानो वरूणेह बोध्यरुश स मा न आयु: प्रमोषी: ॥
शुद्ध स्फटिक संकाशं जलेशं यादसां पतिम् ।
आवाहये प्रतीचीशं वरुणं सर्वकामदम् ॥
ॐ भूर्भव: स्व: वरुण ! इहा
गच्छ, इह तिष्ठ वरुणाय नम:, वरुणमावाहयामि, स्थापयामि ।
6-: (वायव्य कोण में) वायु का आवाहन और स्थापना
ॐ आ नो निबुद्धि: शतिनीभिरध्वर सहस्त्रिणीभिरुप याहि यज्ञम् । वायो अस्मिन्त्सवने मादयस्व यूयं पात स्वस्तिभि: सदा न: ॥
मनोजवं महातेजं सर्वतश्चारिणं शुभम् ।
यज्ञ संरक्षणार्थाय वायुमावाहयाम्यहम् ॥
ॐ भूर्भव: स्व: वायो ! इहा
गच्छ, इह तिष्ठ वायवे नम:,वायु
मावाहयामि, स्थापयामि ।
7-: (उत्तर दिशा में) कुबेर का आवाहन और स्थापना
ॐ कुविदड्ग यवमन्तो यवं चिद्यथा दान्त्यनुपूर्वं वियूय ।इहे
हैषां कृणुहि भोजनानि ये बर्हिषो नम उक्तिं यजन्ति ॥ उपयाम गृहीतोऽस्यश्विभ्यां त्वा सरस्वत्यै त्वेन्द्रायत्वा सुत्राम्ण ।एष ते योनिस्तेजसे त्वा वीर्याय त्वा बलाय त्वा ॥
आवाहयामि देवेशं धनदं यक्ष पूजितम् ।
महाबलं दिव्य
देहं नरयानगतिं विभुम् ॥
ॐ भूर्भव: स्व: कुबेर ! इहा
गच्छ, इह तिष्ठ कुबेराय नम:, कुबेरमावाहयामि, स्थापयामि ।
8-: (ईशान कोण में) ईशान का आवाहन और स्थापना
ॐ तमीशानं जगत
स्तस्थुषस्पतिं धियञ्जिन्वम वसे हूमहे वयम् । पूषा नो यथा वेद साम सद् वृधे रक्षिता पायुर दब्ध: स्वस्तये ॥
सर्वाधिपं महादेवं भूतानां पतिमव्ययम् ।
आवाहयए तमीशानं लोका नाम भय प्रदम् ॥
ॐ भूर्भव: स्व: ईशान ! इहा
गच्छ, इह तिष्ठ ईशानाय नम:, ईशानमावाहयामि, स्थापयामि ।
9-: (ईशान-पूर्व दिशा के मध्य में) ब्रह्मा का आवाहन और स्थापना
ॐ ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्वि सीमत: सुरुचो वेन आव: ।स बुध्न्या उपमा अस्य विष्ठा; सतश्च योनि मसतश्च वि व: ॥
पद्मयोनिं चतुर्मूर्तिं वेदगर्भं पितामहम् ।
आवाहयामि ब्रह्माणं यज्ञ संसिद्धि हेतवे ॥ ब्रह्मण
ॐ भूर्भव: स्व: ब्रह्मणे ! इहा गच्छ, इह तिष्ठ ब्रह्मणे नम:, ब्रह्माणमावाहयामि, स्थापयामि ।
10-: (नैऋत्य-पश्चिम दिशा के मध्य में) अनन्त का आवाहन और स्थापना
ॐ स्योना पृथिवि नो भवानृक्षरा निवेशनी । यच्छा न: शर्मसप्रथा: ।
अनन्तं सर्व
नागा नाम धिपं विश्व रुपिणम् ।
जगतां शान्ति
कर्तारं मण्डले स्थापयाम्यहम् ॥
ॐ भूर्भव: स्व: अनन्त ! इहागच्छ, इह तिष्ठ अनन्ताय नम:, अनन्तमावाहयामि, स्थापयामि ।
प्रतिष्ठा-इस प्रकार आवाहन कर ‘ॐ मनो०’ इस मन्त्र
से अक्षत छोडते हुए प्रतिष्ठा करे । तदनन्तर निम्नलिखित नाम-मन्त्र
से यथालब्धोपचार पूजन करे-‘ॐ इन्द्रादि
दश दिक्पालेभ्यो नम: ।’ इसके बाद ‘अनया पूजया इन्द्रादि
दश दिक्पाला: प्रीयन्ताम्, न मम’-ऐसा उच्चारण कर अक्षत मण्डल पर छोड दे ।
पञ्चलोकपाल आवाहन और स्थापना
नवग्रह-मण्डल में ही चित्रानुसार निर्दिष्ट स्थानों पर गणेशादि पञ्चलोकपालों का बायें हाथ में अक्षत लेकर दाहिने हाथसे छोडते हुए आवाहन एवं स्थापना करे
।
1-: गणेशजी का आवाहन और स्थापना
ॐ गणानां त्वा गणपति हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपति हवामहे निधीनां त्वा निधिपति हवामहे वसो
मम । आहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम् ॥
लम्बोदरं महाकायं गजवक्त्रं चतुर्भुजम् ।
आवाहयाम्यहं देवं गणेशं सिद्धि दायकम् ॥
ॐ भूर्भव: स्व:
गणपते ! इहा गच्छ, इह तिष्ठ गणपतये नम:, गणपतिमावाहयामि, स्थापयामि ।
2-: देवी दुर्गा का आवाहन और स्थापना
ॐ अम्बे अम्बिकेऽम्बालिके न
मा नयति कश्चन ।ससस्त्यश्वक: सुभद्रिकां काम्पील वासिनीम् ॥
पत्तने नगरे ग्रामे विपिने पर्वते गृहे ।
नाना जाति कुलेशानीं दुर्गा मावाहयाम्यहम् ॥
ॐ भूर्भव: स्व:
दुर्गे ! इहा गच्छ, इह तिष्ठ दुर्गायै नम:, दुर्गामावाहयामि, स्थापयामि ।
3-: वायु का आवाहन और स्थापना
ॐ आ नो नियुद्भि: शतिनीभिरध्वर सहस्त्रिणीभिरुप याहि यज्ञम् । वायो अस्मिन्त्सवने मादयस्व यूयं पात स्वस्तिभि: सदा
न: ॥
आवाहयाम्यहं वायुं भूतानां देह धारिणम् ।
सर्वा धारं महा वेगं मृग वाहन मीश्वरम् ॥
ॐ भूर्भव: स्व:
वायो ! इहा गच्छ, इह तिष्ठ वायवे नम:, वायुमावाहयामि, स्थापयामि ।
4-: आकाश का आवाहन और स्थापना
ॐ घृतं घृतपावान: पिबत वसां वसापावान: पिबतान्तरिक्षस्य हविरसि स्वाहा ।
दिश: प्रदिश आदिशो विदिश उद्दिशो दिग्भ्य: स्वाहा ॥
अनाकारं शब्दगुणं द्यावाभूम्यन्तरस्थितम् ।
आवाहयाम्यहं देवमाकाशं सर्वगं शुभम् ॥
ॐ भूर्भव: स्व:
आकाश ! इहा गच्छ, इह तिष्ठ आकाशाय नम:, आकाशमावाहयामि, स्थापयामि ।
5-: अश्विनी कुमारों का आवाहन और स्थापना
ॐ या वां कशा
मधु मत्यश्विना सूनृतावती ।
तया यज्ञं मिमिक्षतम् ।
उपयाम गृहीतोऽस्यश्विभ्यां त्वैष ते
योनिर्माध्वीभ्यां त्वा ॥
देवतानां च भैषज्ये सुकुमारौ भिषग्वरौ ।
आवाहयाम्यहं देवावश्विनौ पुष्टि वर्द्धनौ ॥
ॐ भूर्भव: स्व: अश्विनौ ! इहा गच्छतम्, इह तिष्ठतम्, अश्विभ्यां नम:, अश्विनावावाहयामि, स्थापयामि ।
पञ्चलोकपाला प्रतिष्ठा-
तदनन्तर ‘ॐ
मनो जूति०’ इस मन्त्र से अक्षत छोडते हुए
पञ्चलोकपालों की प्रतिष्ठा करे
।
इसके बाद ‘ॐ पञ्चलोकपालेभ्यो नम:’ इस नाम-मन्त्र से गन्धादि उपचारों द्वारा पूजन कर ‘अनया पूजया पञ्चलोकपाला: प्रीयन्ताम्, न मम’
ऐसा कहकर अक्षत छोड
दे ।
(यज्ञादि विशेष अनुष्ठानों में वास्तोष्पति एवं क्षेत्रपाल देवता का पृथक्-पृथक् चक्र बनाकर उनकीं विशेष पूजा की जाती है । नवग्रह-मण्डल के देवगणों में भी
इनकी पूजा करने का विधान है, अत: संक्षेप में उसे भी यहाँ दिया जा रहा
है -)
1-: -वास्तोष्पति आवाहन और स्थापना –
ॐ वास्तोष्पते प्रति जानीह्यस्मान्त्स्वावेशो अनमीवो भवा न: ।
यत् त्वेमहे प्रति तन्नो जुषस्व शं नो
भव द्विपदे शं चतुष्पदे ॥
वास्तोष्पतिं विदिक्कायं भू शव्याभिरतं प्रभुम् ।
आवाहयाम्यहं देवं सर्व कर्म फल प्रदम् ॥
ॐ भूर्भव: स्व:
वास्तोष्पते ! इहा गच्छ, इह
तिष्ठ वास्तोष्पतये नम:, वास्तोष्पति मावाहयामि, स्थापयामि ।
2-: क्षेत्रपाल का आवाहन-स्थापन
ॐ नहि स्पशमविदन्नन्यमस्माद्वैश्वानरात्पुर एतारमग्ने: ।
एमेनमवृधन्नमृता अमर्त्यं वैश्वानरं क्षैत्रजित्याय देवा: ॥
भूत प्रेत पिशाचाद्यैरावृतं शूल पाणिनम् ।
आवाहये क्षेत्रपालं कर्मण्यस्मिन् सुखाय न: ॥
ॐ भूर्भव: स्व: क्षेत्राधिपते ! इहा गच्छ, इह तिष्ठ क्षेत्राधिपतये नम:, क्षेत्राधिपति मावाहयामि, स्थापयामि ।
ॐ मनो जूति०’ इसे
मन्त्र से प्रतिष्ठा कर ‘ॐ क्षेत्रपालाय नम:’ इस नाम-मन्त्र द्वारा गन्धादि उपचारों से पूजा करे ।